America Decodes China Nuclear Plan: अमेरिकी सरकार ने हाल ही में दावा किया है कि चीन ने 2020 में गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण किया था, जो उसके 1996 से चले आ रहे स्व-घोषित परीक्षण प्रतिबंध का उल्लंघन है। अमेरिका के इस दावे से वैश्विक सुरक्षा और परमाणु हथियारों के संतुलन पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
अमेरिका का कहना है कि पिछले छह वर्षों में चीन ने अपनी परमाणु क्षमता में भारी वृद्धि की है और अब उसके पास लगभग 600 परमाणु हथियार हैं, जबकि 2030 तक यह संख्या 1000 से अधिक हो सकती है। यह दावा अमेरिकी राज्य विभाग और रक्षा विभाग की हालिया रिपोर्टों, वरिष्ठ अधिकारियों के बयानों पर आधारित है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, 22 जून 2020 को चीन के शिनजियांग प्रांत में स्थित लोप नूर परमाणु परीक्षण स्थल के पास एक घटना हुई थी। कजाकिस्तान में स्थित एक सिस्मिक स्टेशन ने 2.75 मैग्नीट्यूड का एक छोटा भूकंप दर्ज किया था जिसका केंद्र लगभग 450 मील दूर लोप नूर था।
अमेरिकी राज्य विभाग के आर्म्स कंट्रोल एंड नॉनप्रोलिफरेशन के असिस्टेंट सेक्रेटरी क्रिस्टोफर येओ ने हडसन इंस्टीट्यूट में दिए भाषण में यहां तक कहा था कि यह घटना किसी विस्फोट से मेल खाती है, और इसमें न्यूक्लियर एक्सप्लोसिव टेस्ट होने की बहुत अधिक संभावना है। येओ ने यह भी कहा था चीन ने डिकपलिंग तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसमें विस्फोट को नमक की परतों या अन्य तरीकों से छिपाया जाता है ताकि सिस्मिक तरंगें कमजोर पड़ जाएं और अंतरराष्ट्रीय निगरानी से बचा जा सके।
अमेरिकी अंडर सेक्रेटरी थॉमस डिनानो ने फरवरी 2026 में जेनेवा में डिसआर्ममेंट कॉन्फ्रेंस में भी इसी तरह का दावा किया था। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि यह परीक्षण चीन की नई पीढ़ी के परमाणु हथियारों के विकास से जुड़ा था, जैसे लो-यील्ड टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स और मल्टीपल इंडिपेंडेंट रीएंट्री व्हीकल (MIRV) तकनीक।
CNN की रिपोर्ट के अनुसार, यह टेस्ट चीन के परमाणु हथियार कार्यक्रम को पूरी तरह से बदलने की दिशा में एक कदम था। हालांकि, सैटेलाइट इमेजरी का विश्लेषण करने वाली CSIS जैसी संस्थाओं ने 2020 की इस तारीख पर कोई असामान्य गतिविधि नहीं पाई, जिससे दावे पर सवाल उठे हैं। चीन ने भी इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा है कि अमेरिका के आरोप पूरी तरह निराधार हैं और यह झूठी अफवाहें फैलाने का प्रयास है। चीन का कहना है कि वह 1996 से परमाणु परीक्षण नहीं कर रहा और उसकी नीति न्यूनतम प्रतिरोध पर आधारित है।
अमेरिकी रक्षा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के पास 2024 के मध्य तक 600 से अधिक ऑपरेशनल परमाणु हथियार थे। यह संख्या 2020 में लगभग 200-350 के बीच अनुमानित थी, यानी छह वर्षों में लगभग 400 नए हथियार जोड़े गए। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) और SIPRI की 2025 रिपोर्ट्स भी यही अनुमान लगाती हैं कि चीन के पास अब करीब 600 वारहेड्स हैं, और यह दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ता परमाणु भंडार है। पेंटागन का अनुमान है कि 2030 तक चीन के पास 1000 से अधिक ऑपरेशनल परमाणु हथियार होंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन अपनी न्यूक्लियर ट्रायड को भी मजबूत कर रहा है।
अमेरिकी अधिकारी क्रिस्टोफर येओ ने फरवरी 2026 में कहा कि बीजिंग बिना किसी पारदर्शिता के अपनी परमाणु क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि चीन अगले 4-5 वर्षों में अमेरिका के साथ परमाणु समानता हासिल कर सकता है। यह दावा ऐसे समय आया है जब न्यू START संधि (अमेरिका-रूस) 2026 में समाप्त हो रही है और अमेरिका ने परमाणु परीक्षण फिर शुरू करने की बात कही है। ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिका ने कहा है कि वह चीन और रूस के साथ बराबरी पर टेस्ट करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह वृद्धि न्यूनतम प्रतिरोध से हटकर अधिक लचीली नीति की ओर इशारा करती है, हालांकि चीन नो फर्स्ट यूज नीति पर कायम है। SIPRI और FAS जैसे संगठन कहते हैं कि चीन अभी भी अमेरिका (लगभग 5000+) और रूस (6000+) से बहुत पीछे है, लेकिन उसकी गति चिंताजनक है। यह विवाद वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण को प्रभावित कर सकता है। अमेरिका चाहता है कि चीन भी किसी बहुपक्षीय संधि में शामिल हो, लेकिन बीजिंग कहता है कि पहले अमेरिका-रूस अपने हथियार कम करें।
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